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बीते हुए पल...

Posted On: 24 May, 2012 Others में

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कितने सालों के बाद हम सब साथ में थे लेकिन एक बार फिर से अलग अलग होने का समय नज़दीक था बस कुछ मिनट ही बाकी थे….. न जाने कहा से बचपन की बातें शुरू हो गयी….. पहले भैया की बात फिर मेरी और फिर छोटे भाई की शरारतें….. एक बार फिर से उस बचपन में पहुँच गए थे जहाँ कोई फिक्र नहीं होती थी….. बस जो काम कर रहे हैं उसी पर ध्यान होता था…कल क्या करेंगे कभी नहीं सोचते थे…. भैया का शैतानी करके भूल जाना…. मेरा गवाही देना…. भैया का साइड लेना… और छोटे भाई की पिटाई होना….. :) (मैं हमेशा से भैया के लिए biased रहती थी….) !! कितने अच्छे थे वो बचपन के दिन…..

काश मैं बचपन दोबारा जी पाती
वही शैतानियाँ वही खेलकूद
फिर से कर पाती
वो सबका स्कूल जाना
वापस चेन बनाकर चलना
शहतूत और अमरुद तोडना..
भीगते हुए
रिक्शे को धक्का देकर आगे बढ़ाना..
काश एक बार फिर से कर पाती….
वो साथ साथ पढना…
एकदूसरे को जगाना
अरे भाई सो मत जाना….
बड़ा याद आता है….
काश मैं फिर से जी पाती….
वो सावन में झूला
अक्सर शुक्रवार को काले बादलों का आना…
चांदनी रात में बच्चो का खेलना
बड़ा याद आता है….
काश मैं फिर से जी पाती…

और एक आज का समय है….. जिसमे सिर्फ वर्तमान में नहीं रह पाते भूत और भविष्य में ही घूमते रहते हैं…. कल क्या हुआ था… कल क्या होगा…. इसी में ज़िन्दगी बीती जा रही है….

ज़िन्दगी गुजर रही है
कल की फिक्र में….
आज की नहीं परवाह
इतनी हलचल में…
रुकना चाहती हूँ दो पल
जी लूं इस पल को….
थम जाए वक़्त यही….
रोक दूं उस कल को….
कुछ पाने की ललक
कुछ खोने की तड़प
बस इसी में बीत रहा है जीवन…
कैसे गुजर रहा है ये सफ़र
एक एक पल में….
आने वाले कल में…
भूल रहे हैं हम रिश्ते…
औपचारिकता बन रहा है प्यार
इस दौड़भाग में…
थम जा यहीं
रुक जा यहीं…
ऐ पल…..
बहुत कुछ छूट रहा है पीछे!!

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 2, 2012

बचपन के दिन भुला न देना आज हँसे कल रुला न देना बहुत खूब कहा आपने, आप ने इसका भरपूर आनंद लिया. मैं इस लाभ से एकलौता होने के कारण स्वयं तो वंचित रहा. पर अपने ३ बच्चों के सुख को देख कर सुखी हुआ. पर जब मैं अपने पोते को जो ७ साल का है अकेले खेलते देखता हूँ तो उसके एकाकी पन का अहसास होता है. आज के परिवेश में परिवार बढ़ाना उचित भी तो नहीं लगता. बधाई.

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 2, 2012

    जी सर, आज माहौल काफी बदल चुका है और इसका थोडा बहुत असर दिखाई भी देता है बच्चों के व्यवहार में…..

yogi sarswat के द्वारा
May 28, 2012

ज़िन्दगी गुजर रही है कल की फिक्र में…. आज की नहीं परवाह इतनी हलचल में… रुकना चाहती हूँ दो पल जी लूं इस पल को…. थम जाए वक़्त यही…. रोक दूं उस कल को…. कुछ पाने की ललक कुछ खोने की तड़प बस इसी में बीत रहा है जीवन… साधना जी , बहुत ही सटीक बात कही आपने ! हम कल के फेर में अपने आज को बर्बाद कर रहे हैं ! बेहतर रचना !

अजय कुमार झा के द्वारा
May 26, 2012

ओह क्या क्या न याद दिला दिया आपने :) काश …हां सच कहा आपने ..काश कि ..कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन :)

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 28, 2012

    Ajay ji, ye human nature hai jo beet chuka hai vo hume bada pyara lagta hai…. aur jo present me hai use hum bhaav hi nahi dete…. :) jab ye present bhi past ban jayega tab bada yaad aayega…. :)

May 26, 2012

मुझे मत मरो मेरा क्या कसूर है………. http://satyaprakash.jagranjunction.com/2012/05/25/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B8/#comment-१२ किसी भी धर्म के लोग हो उन्‍हे आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और सरकार से भी निवेदन करना चाहिए कि इस तरह के कार्यक्रमो पर रोक लगायी जाय, मै आप सभी का आग्रह करना चाहता हुँ कि आप निम्‍न माबाईल न0 फोन कर इसे राकने का आग्रह करे जिलाधिकारी गोरखपुर 9454417544 आयुक्‍त गोरखपुर 9454417500 एस एस पी गोरखपुर 945440273 आई जी गोरखपुर 9454400209 एस पी आरए 9454401015 योगी आदित्‍यनाथ सांसद गोरखपुर 0551-2255454, 53

May 26, 2012

और एक आज का समय है….. जिसमे सिर्फ वर्तमान में नहीं रह पाते भूत और भविष्य में ही घूमते रहते हैं…. कल क्या हुआ था… कल क्या होगा…. इसी में ज़िन्दगी बीती जा रही है………….

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 28, 2012

    वक़्त की चिड़िया फुर्र हो गयी……

चन्दन राय के द्वारा
May 26, 2012

साधना जी , बचपन की मासूमियत और निर्मल मन की पावन यादों को आपने उतने ही सरलता से और मासूमियत से पिरोया अंतिम पंक्ति का संबोधन हां कहता है वो , जो कोई दार्शनिक कहता है

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    बहुत शुक्रिया चन्दन जी…. :)

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है पेज 40-41 में .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    महिमा जी…. आपका कहना सही है…. लेकिन मैं कहूँगी की ठीक है…. शिकायत मत कीजिये…. कभी कभी होता है कि कोई इंसान कॉपी करके शुरुआत करता है और एक दिन खुद की रचनाएं भी बनाने लगता है….. मैंने इनका ब्लॉग पढ़ा नहीं है…. हर लेखक कही न कहीं से inspired ही होता है….. इसलिए….. :) :)

follyofawiseman के द्वारा
May 25, 2012

ई कविता मैं ने ‘नन्हे-सम्राट’ पढ़ा था…आपने इसे वहीं से उठाया है क्या….?

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    क्या खूब याद दिलाया…… चाचा चौधरी और साबू… पिंकी और नागराज…. क्या खूब मस्ती करते थे… काश मैं ये सब फिर से कर पाती…. और अब…. database की किताबे…. SQL की कहानियां… समझनी पड़ती हैं…. दिनभर कंप्यूटर के सामने… आँखे फोड़नी पड़ती हैं…. काश वो बचपन फिर से आ जाए…. :)

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

इतनी हलचल में… रुकना चाहती हूँ दो पल जी लूं इस पल को…. थम जाए वक़्त यही…. रोक दूं उस कल को…. कुछ पाने की ललक कुछ खोने की तड़प बस इसी में बीत रहा है जीवन… कैसे गुजर रहा है ये सफ़र एक एक पल में…. आने वाले कल में… भूल रहे हैं हम रिश्ते… औपचारिकता बन रहा है प्यार इस दौड़भाग में… थम जा यहीं रुक जा यहीं… ऐ पल……… बहुत बढ़िया साधना जी .. आपमें तो अपनी नहीं हम सब के दिलो की बात कह दी … बधाई आपको

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    शुक्रिया महिमा जी….. :)

dineshaastik के द्वारा
May 25, 2012

साधना जी, बचपन की यादों के साथ, अंत में सुन्दर संदेश, बहुत ही सराहनीय है।

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    शुक्रिया दिनेश जी…

sinsera के द्वारा
May 25, 2012

साधना जी, ओह सॉरी, साधना…. लगता है आप ने बचपन में भाइयों को बहुत सताया है….या लडकियाँ होती ही ऐसी हैं..मुझे याद आया, मेरा बेटा , बेटी से महज़ ढाई साल छोटा, लेकिन वो उसको बचपन से ही ऐसा प्रताड़ित करती थी की बेचारा शायद ही कभी नए मोज़े पहन कर स्कूल गया हो…एकही नाप के मोज़े….वो पट्टी पढ़ा के अच्छे वाले खुद ले लेती थी और पुराने उस के हवाले…अब तो खैर पढाई के चक्कर में दोनों साल में दो बार ही मिल पाते हैं और मिलने / बिछड़ने में रोते भी हैं…जैसा कि आपने कहा.. इतनी हलचल में… रुकना चाहती हूँ दो पल जी लूं इस पल को…. थम जाए वक़्त यही…. रोक दूं उस कल को…. बहुत खूब…….

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    :) सरिता जी मैंने बचपन में कभी नहीं सताया किसी को भी…. हाँ अब ज़रूर सताती हूँ… :) बचपन में मैं बड़ी प्यारी सीधी सी थी…. :) हाँ भैया से मेरी बोन्डिंग ज्यादा स्टोंग है…. और छोटे भाई से लडाईया ज्यादा होती थी…..

pawansrivastava के द्वारा
May 24, 2012

This has sent me down the memory lane …तुम्हारी इस रचना ने मुझे यादों के भूलभुलैया में फिर से भटका दिया …और कविता के अधखिले फूल को तुमने क्यूँ बंद कर दिया ….अच्छी कविता बन रही थी ज़रा सा जोर लगाना था बस

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    वो कहते हैं ये आंसू नहीं खारा पानी है….. हम कहते हैं पानी ही सही…. पर कभी तो चखा है तुमने…


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