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अंत या शुरुआत.....

Posted On: 5 Jun, 2012 Others में

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“गुड night मेसेज से उनदोनों की बातों की शुरुआत होती थी….. फिर वो पूछती क्या कर रहे हो…… उधर से कोई जवाब न आता… फिर वो कहती ‘पता है…आज मेरी “उससे” बात हुई….’ तुरंत से reply आता “किससे”….. इधर वो मुस्कराती रहती….. फिर कहती…. ‘किसी से नहीं’…… फिर धीरे धीरे बात मेसेज से फ़ोन कॉल तक पहुँच जाती…..” पागल थी वो उसके लिए….. हर पल हर वक़्त बस उसी के ख्यालों में खोयी रहती…. सुबह शाम दिन रात सोते जागते बस एक ही नाम गूंजता था उसके जेहन में…. लेकिन फिर भी हर दिन लड़ते थे दोनों….. उसे तब बहुत गुस्सा आता जब वो दूसरी लड़कियों के नाम लेकर उसे छेड़ता था.. उस वक़्त वो उन दोनों की आखिरी बात होती थी..!! कुछ देर दोनों चुप रहते…. लेकिन फिर फ़ोन मेसेज…. शायद वो उससे ‘दूर’ नहीं रह सकती थी……इतनी दूर रहने के बाद भी!!

बहुत खुश रहती थी वो उसके ख्यालों में खो कर…. उन्होंने जीने मरने की कसमे नहीं खायीं…. साथ रहने का कोई वायदा नहीं किया…. फिर भी वो उसमे हर वक़्त डूबी रहती थी…..उसने कभी नहीं सोचा था आगे क्या होगा…. वो क्या करेगी….. बस वो उस हर एक पल को जी लेना चाहती थी जो उसके सपनों के राजकुमार से जुड़ा था!

वो प्रेम में थी….. अनंत प्रेम में…. जहाँ बदले की कोई ख्वाहिश नहीं थी….. कोई उम्मीदें नहीं पाल रखी थी उसने…. जो कुछ उसे चाहिए होता था बोलकर, नाराज़ होकर, रोकर… ले ही लेती थी….!!

ये तो थी एक कहानी….. लेकिन हम जब प्रेम में होते हैं तो पाने की ख्वाहिशें प्रबल हो जाती हैं…. उम्मीदें बढ़ जाती हैं…. उस एक इंसान से…. !! हम भूत भविष्य सोच कर परेशान होने लगते हैं…. सारी मुश्किलें, सारी परेशानियाँ सामने आने लगती हैं….. पारिवारिक बंधन जकड़ने लगते हैं…. एक तरफ माँ बाप का प्यार होता है…. तो दूसरी तरफ अपनी खुशियाँ… कैसा द्वन्द चलता है अंतर्मन में!! इन दोनों प्रेम में भयंकर घमासान होने लगता है….. “अंत में विजय होती है माँ बाप के प्रेम की…. उनके दिए संस्कारों की…. !! ” जी बिल्कुल नहीं….. विजय होती है उस प्रेम की जो उसे शक्ति देता है अपनी खुशियाँ त्यागने की…. अपने परिवार के लिए…..उनकी खुशियों के लिए… उनकी तथाकथित मर्यादा के लिए….. !!

ना जाने ये जीवन का अंत होता है या शुरुआत!!
दोस्तों मैं आप सभी को एक बात बताना चाहती हूँ ये मेरा आखिरी पोस्ट है…… हो सकता है मैं कुछ समय बाद अपना ब्लॉग भी हटा दूं….!!
मुझे यहाँ पर कई अनुभव मिले अच्छे और बुरे दोनों….. और दोनों से ही मझे बहुत कुछ सीखने को भी मिला!! कुछ अच्छे दोस्त मिले…. कभी मौका मिला तो मैं अपने इन दोस्तों से मिलने की इच्छा भी रखती हूँ…..!!

न जाने ये जीवन का अंत है या शुरुआत…….!! :)

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी…….कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने……….बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. मधुर भाव लिये भावुक करती रचना,,,,,,

yamunapathak के द्वारा
June 9, 2012

साधनाजी,यह आपका अंतिम ब्लॉग है यह मत कहिये आप एक बार मेरे नए ब्लॉग रूहों में समाये रिश्ते पढ़िए, और कुछ ना कुछ लिखते रहिये भले ही अंतराल में ही क्यों ना???????// मैंने अपने ब्लॉग अकेली हूँ से भी कुछ कहना चाहा है. आपके शब्द पढ़ती हूँ सिस्टम सही रहता है तो कमेंट्स सबमिट हो जाते हैं . अंत करना किसी भी चीज़ का हमारे वश में नहीं ज़िंदगी नदी की धारा है आगे बढ़ती है मंजिल भी पाती है पर राहों में पत्थर,चट्टानों से टकराते हुए,जीवन kabhee भी seedhee sadak पर नहीं chaltaa उछलती कूदती चंचल दरिया सी बहता है. मंच पर उपस्थित अपने संगी साथियों का ही हमारे लिखने से मार्गदर्शन ना हो पाए तो पुरे समाज के प्रति यह ज़िम्मेदारी भी कैसे निभे? हम सब कोसों दूर बैठकर भी एक दुसरे के सुविचारों से प्रभावित होते हैं.साधना,तुम इस मंच से नहीं जा रही हो. अच्छी शिक्षा पलायनवादिता नहीं परिस्थितियों का समझदारी से समाधान में निहित है अगर मेरी प्रतिक्रया के प्रत्येक लब्ज़ को समझ सको तो अपनी rachanaatmaktaa को अपनी सबसे मजबूत शक्ति बनाओ. सप्रेम यमुना

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 9, 2012

    आपका बहुत स्वागत है….. :) आपका हुक्म सरांखों पर…….:) जानकार ख़ुशी हुई की आप मेरे शब्द पढ़ती हैं…. :) आपकी हर लाइन से सहमत हूँ…. और कोशिश करुँगी कि आपकी बात को अपने जीवन में उतार सकूँ…. !!

meenakshi के द्वारा
June 8, 2012

साधना जी , जीवन का नाम चलते रहना ..बढतें रहना ..इसका हर पल नया होता है ..और हमें सदा उसका ख़ुशी से सूझ – बूझ से स्वागत करना होता है ; अनेक शुभकामनाओं के साथ … मीनाक्षी श्रीवास्तव

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 9, 2012

    शुक्रिया मीनाक्षी जी, :) सहमत हूँ मैं आपसे…..

sadhna srivastava के द्वारा
June 8, 2012

रौशनी जी, चन्दन जी, प्रदीप सर, दिनेश जी,रेखा जी, विक्रम जी आप सभी की प्रतिक्रियाओं का बहुत बहुत शुक्रिया! ठीक ही कहा है हम कभी नहीं जानते कि अब अंत है या शुरुआत… ये सब वक़्त पर निर्भर है….!!

dineshaastik के द्वारा
June 8, 2012

आदरणीय  साधना जी प्रेम  के संबंध में मेरे विचारों में विरोधाभास  है। समय परिस्थितियों, समय  एवं उम्र  के साथ  विचारों में परिवर्तन  होना स्वाभाविक  है। परिवर्तन  प्रकृति का स्वाभाविक  नियम  है। जो विचार में नीचे उद्दत  कर  रहा हूँ वह नवयौवन  काल  के थे। आज  मेरा उन  विचारों से सहमत  होना संभव नहीं है- प्रेम सचमुच  ईश्वर का रूप, अरे जीवन है प्रेम  का कूप। प्रेम  को ईश्वर पूजा मान, प्रेम  में बसते हैं भगवान। प्रेम  में होता नहीं है स्वार्थ, प्रेम  करता है बस  परमार्थ। प्रेम  है केवल  नाजुक  चीज, हृदय में रहे प्रेम  का बीज। प्रेम  जग  में हर जगह  बिखेर, चाह अपना हो चाहे गैर। प्रेम  है ईश्वर का वरदान, प्रेम  से जीतो सकल  जहान। प्रेम  का न  है कोइ आकार, प्रेम  के होते विविध  प्रकार। प्रेम  का होता न कोइ मोल, प्रेम  तो होता है अनमोल। प्रेम  पर कब  किसका है जोर, जगत में प्रेम  प्रेम  का शोर। प्रेम  तो छीने दिन  का चैन, और  निन्द्रा न  आये रैन। प्रेम  है शीत  प्रेम  है आग, मिले उनको ही जिनका भाग। यह प्रेम  का एक  रूप है दूसरा रूप  फिर कभी……

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 8, 2012

    दिनेश जी पहला रूप तो बड़ा ही मनभावन है…… :) अब दूसरे रूप का इंतज़ार है….!!

vikramjitsingh के द्वारा
June 7, 2012

ये तो कोई बात न हुई…..ऐसे थोडा न होता है….कोई वजनदार कारण भी तो होना चाहिए…? साधना जी…..ऐसे जाना अच्छी बात नहीं….. हम भी पूरे एक महीने बाद वापिस आये हैं…..और पहली बार आपके ब्लॉग पर आये हैं…..और पहली बार आपको कह रहे हैं…..कुछ तो सोचिये….?????

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 8, 2012

    अरे!! ऐसे कैसे…. बिल्कुल कोई बात नहीं है ये…..! आपका बहुत स्वागत है मेरे ब्लॉग में आने के लिए विक्रम जी…. :)

rekhafbd के द्वारा
June 6, 2012

साधना जी ,आपका लेख पहली बार पढ़ा है ,आप बहुत अच्छा लिखती है ,जीवन का अंत या शुरुआत हमारे हाथ में है ही नही ,हमे तो सिर्फ चलते जाना है ,इस राह नही तो उस राह,जो भी राह पकड़ो मेरी शुभ कामनाएं

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 8, 2012

    आपकी शुभकामनाओं के लिए बहुत सारा धन्यवाद रेखा जी…..

dineshaastik के द्वारा
June 6, 2012

आदरणीय  साधना जी आपका आलेख  पढ़ते पढ़ते योजना  बना रहा था  कि प्रेम  के संबंध  में इस  तरह की टिप्पणी दूँगा। सोचा था प्रेम  के संबंध में बहुत  विस्तार से लिखूँगा। जीवन के सच्चे अनुभव  लिखूँगा। किन्तु अंत  के दो पैराग्राफ  हृदय  की गति रोकते रोकते बचा गये। हार्ट  अटैक  से यदि पीङित  होता तो संभवतः मुश्किल  होता। आप जैसी बेपाक होकर अपनी बात  कहने वाली, सत्य के लिये संघर्ष  करने वाली, अन्याय का पुरजोर  विरोध  करने वाली लेखिका से हमें वंचित  होना पङेगा। कृपया अपने निर्णय  पर पुनर्विचार करिये। हमें अपनी लेखन  कला से वंचित  नहीं करिये। आपका आभार व्यक्त करूँगा।

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 6, 2012

    आदरणीय दिनेश जी…… आखिरी पैराग्राफ से पहले के लिए आप निश्चिन्त होकर अपनी टिपण्णी दीजिये…. एकदम विस्तार से लिख दीजिये….. मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ…. :) :)

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 5, 2012

आप वो गुजरा वक्त नहीं जो लौट के आ न सके साहित्य चमन के फूल आप दूसरा इसे महका न सके baharon ko to aana hai बहारें fir भी आएँगी kami hogi manch par yaaden muskarayengi. aadarniy saadhna ji, saadar. vichar kar len.

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 8, 2012

    Thank you so much Sir…. आपकी ये पंक्तियाँ भावनाओं से ओतप्रोत हैं…..

चन्दन राय के द्वारा
June 5, 2012

साधना जी , प्रेम से जुडी हर बात लिख दी आपने ,शत प्रतिशत सही लिखा है आपने , और हां ये मंच जीवन की तरह , जन्हा खुशिया भी बहुत है, जदोजहद भी बहुत है , पर सायद जिन्दगी भी तो ऐसी है , सायद बुरा अनुभव इसलिए की हमारी उम्मीदे ज्यादा है या बढती ही जाती है , आज के इंसान की सबसे बड़ी कमी ये है की बस वो अपनी सुनाना चाहता , मेरा दर्द , ये वो पर कभी हम दुसरो को सुनने का मौका ही नहीं देते , कहने का मौका नहीं देते , जो आपने लिखा सायद हर कोई ऐसा ही सोचता हो ! इक विनम्र आग्रह आप मंच से ना जाइए , यदि समय की किल्लत है तो कम समय दिजिय पर मंच पर रहीय ,

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 8, 2012

    जी चन्दन जी, ये मंच जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है….. मैं आपकी बात से सहमत हूँ….

roshni के द्वारा
June 5, 2012

साधना जी आज आपको पहली बार पढ़ा और आपकी पोस्ट पढ़कर लगा की शायद आखरी बार .. मगर सच तो ये है की आना जाना चाहे जीवन में हो या कही और अपने हाथ में नहीं होता … और अक्सर अंत ही नयी शुरवात बन जाती है .. सुंदर रचना सुंदर विचार

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 8, 2012

    Thank you so much Roshni ji…. you are most welcome on my blog.


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