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आत्म-साक्षात्कार....

Posted On: 9 Jun, 2012 Others में

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“साक्षात्कार” मतलब दो व्यक्तियों के बीच प्रश्न और उत्तर के माध्यम से विचारों का आदान प्रदान… या यूँ कहें किसी एक व्यक्ति को जानना!!
हम सभी ने साक्षात्कार तो बहुत लिए और दिए होंगे लेकिन क्या कभी आत्म साक्षात्कार किया है……? मैंने अक्सर लोगों को ये कहते हुए सुना है कि मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता हूँ / जानती हूँ ….. ये कैसे संभव है….?
अगर किसी ने आत्म साक्षात्कार किया होगा तो वह व्यक्ति ऐसा कभी नहीं बोलेगा!! हम खुद को ही नहीं जानते….. किसी दूसरे को जानना बहुत मुश्किल है…. असंभव है…. !!

अभी कुछ दिनों पहले मुझे मेरे एक मित्र ने बोला कि “तुम दुखवादी हो!” मुझे बड़ा कष्ट हुआ सुनकर…. क्रोध भी आया… विश्वास ही नहीं हुआ… कोई कैसे कह सकता है ये ….. !! मैं सोच रही थी मैं तो हर वक़्त हँसती मुस्कराती रहती हूँ…. मेरा चित्त प्रसन्न रहता है…. जो दिमाग में आता है बोल देती हूँ…. फिर मैं कैसे दुखवादी हो गयी….?? मैंने अपने मित्र की बात पर गहन विचार किया…. मैं अपने हर एक कदम पर नज़र रखने लगी… फिर मैंने गौर किया कि मैं जो बातें बोल देती हूँ वो अक्सर दुःख की ही होती हैं…. इसका मतलब कही अन्दर गहरा दुःख समाया हुआ है…. जिससे मैं अनजान हूँ!!

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हम खुद को ही नहीं जानते तो किसी दूसरे को कैसे जानेंगे…. लोगों की बोली हुई बातों पर हमारा उपरी मन बहुत जल्दी भरोसा कर लेता है… जैसा किसी ने कह दिया वैसी ही भ्रांतियां हम पाल लेते हैं…किसी ने अगर तारीफ कर दी तो हम उसे ही सच मान बैठते हैं….लेकिन अगर कुछ बुरा बोल दिया तो उसका विरोध करते हैं भले ही हमारा अंतर्मन उस बात को सही समझता हो…..क्योंकि हम अपना एक image बनाकर रहते हैं…. महानता का image …… लेकिन सच्चाई कुछ और होती है..हमारा भीतरी मन हर एक बात को समझता है …… और इस सच्चाई से वाकिफ हम तब होते हैं जब आत्मा साक्षात्कार करते हैं….!! आत्मसाक्षात्कार से हमे शक्ति मिलती है जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करने की….. क्योंकि हम खुद को पहचान चुके होते हैं…. !!

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49 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
June 23, 2012

साधनाजी यह बहुत ज़रूरी है मैंने शुरुआत पर इस विषय पर एक ब्लॉग भी लिखा था.आप मंच पर लिखना जारी राखी हैं इसका shukriya.

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 25, 2012

    शुक्रिया मैम, मैं आपकी शुक्रगुज़ार हूँ….. :) :)

pritish1 के द्वारा
June 18, 2012

नमस्ते….साधना जी मैंने आपके लेख से सदैव बहुत कुछ सिखा है……. मैंने अपनी कहानी ऐसी ये कैसी तमन्ना है…..१ का दूसरा भाग प्रकाशित किया है….कृपया मेरी कहानी के विषय मैं आप मुझे उपयुक्त सुझाव दें…….. ………..प्रीतीश

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 18, 2012

    शुक्रिया प्रीतीश…. मैं आपकी ये कहानी ज़रूर पढूंगी…… :)

roshni के द्वारा
June 12, 2012

साधना जी , खुद से खुद को मिलवाना ही भूल गया मै , दुनिया मे हर किसी से मिलता रह यु में … सुंदर आलेख

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 13, 2012

    शुक्रिया रौशनी जी…….

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
June 12, 2012

बढ़िया एवं सुन्दर लेख |

R K KHURANA के द्वारा
June 11, 2012

प्रिय साधना जी, बहुत सुंदर लेख ! बधाई राम कृष्ण खुराना

chaatak के द्वारा
June 11, 2012

साधना जी, आपकी इस लेख को पढ़कर अच्छा लगा| सही है की हम अपनी नज़र में अपनी एक इमेज बना लेते हैं और फिर आत्मुग्ध होने की इस दशा से निकल नहीं पाते हैं|

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 11, 2012

    आशीष जी मेरे लेख को पसंद करने के लिए बहुत धन्यवाद…… :)

dineshaastik के द्वारा
June 11, 2012

साधना जी मेरा मानना है कि यह कहना कि मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ, अज्ञानता का घोतक  है। हाँ यदि यह कहा जाय  कि मैं उसे संभवतः जानता हूँ, तो इसका विरोध  करने या आलोचना करने का कोई आधार नहीं है। मेरा अनुमान है कि आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, फिर आत्मसाक्षात्कार  कैसे संभव है। मृत्यु के डर की आशंका ने मनुष्य  नें प्रथम  तो आत्मा की कल्पना की, फिर  आत्मा को अमर बना दिया और उसने मृत्यु के डर की आशंका को समाप्त कर  दिया। मैंने लोंगो से कहते सुना है कि मेरी आत्मा कहती है, मैं आत्मा से बोलता हूँ, मेरा आत्मा को ठेस  पहुँची है। भाई आत्मा में अभिव्यक्ति की शक्ति कहाँ से आती है। आत्मा कैसे बोलती है। यदि हम यह सवाल  करते हैं तो कहते हैं, तुम  क्या समझोगे इन बातों को यह अध्यात्म का रहस्यवाद है। अपने शब्दों के जाल  में ऐसा उलझा देंगे कि जब आपको उनकी भाषा समझ  में नहीं आयेगी तो अपनी नसमझी को छुपाने के लिये उनकी हाँ में हाँ मिला दोगे। यह मस्तिष्क के ही भाग  हैं जिन्हें हम  मन, आत्मा आदि का नाम  देते हैं। यह भी जरूरी  नहीं कि जो मेरी धारणा है वही सही हो। मेरा मानना है कि ज्ञान  कि अपूर्णतः से ही ईश्वर  का अस्तित्व है, ज्ञान  की पूर्णतः से ईश्वर  विलोपित  हो जायगा। परिवर्तन  प्रकृति का स्वाभाविक  नियम  है और यह  नियम हमारी सोच  एवं विचारों पर भी लागू होती है, यह हम  कभी यह नहीं कह सकते कि हम अपने आपको पूर्ण  रूप से जानते हैं फिर दूसरे  को जानने का तो कोई आधार दृष्टगत  नहीं होता। हर व्यक्ति अपने आपको महान  एवं सही स्थापित  करने के लिये परिभाषाओं का निर्माण एवं चयन करता है। समय  के परिवर्तन  के साथ  उसके विचारों एवं सोच  में परवर्तन  के  कारण  उसकी पूर्व  में चयनिय  एवं निर्मित  की गई परिभाषायें भी बदलती रहतीं हैं।  कोई  विचार या वस्तु किसी व्यक्ति के लिये लाभप्रद एवं उपयोगी हो वही दूसरे के लिये हानिकारक  एवं अनुपयोगी हो जाती है।  जैसे बीमार व्यक्ति् के लिये दवा उपोयगी है,  जबकि स्वस्थ  व्यक्ति के लिये अनुपयोगी है। विद्यार्थी के लिये उसके पुस्तक  उपयोगी किन्तु अशिक्षित  के लिये अनुपयोगी। यही नियम  सुख  एवं दुख  को प्रभावित  करते हैं। सुख  दुख  तो चक्र  की तरह चलते रहते हैं। आपके आलेख  से मैं सहमत  भी हूँ और असहमत भी, यह  विरोधाभास  की स्थिति सर्वत्र विद्यमान  हैं लेकिन  हम  इसे अनदेखा कर देते हैं। लेकिन  फिर  भी आपका आलेख  बहुत ही प्रभावशाली एवं अपनी तरफ  आकर्षित करने वाला है। बधाई….

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 13, 2012

    मुझे आपकी बात ज़रा भी नहीं समझ आई…….

    dineshaastik के द्वारा
    June 16, 2012

    कहने का तात्यपर्य  है कि आत्मा और ईश्वर  का अस्तित्व नहीं होता, मानव की स्वार्थ  बुद्धि ने इन्हें जन्म  दिया। आत्मा और ईश्वर आदि पर विश्वास करने वाले लोग  नास्तिक  होते हैं। जो असत्य में विश्वास  करते हैं। जब आत्मा नहीं होती तो आत्मा से साक्षात्कार कैसे हो सकता है।

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 16, 2012

    हाँ जी बस यही तो सुनना चाहते थे हम….. :) :) Clarity of Thought is very necessary. ऐसे कमेंट्स में मज़ा आता है जो सच बयां करते हैं…… और ईमानदारी से लिखे जाते हैं….. चाहे वो नकारात्मक हो या सकारात्मक…..!!

    dineshaastik के द्वारा
    June 25, 2012

    क्या मैं अपने ब्लॉग  पर  आपके आने का इंतजार कर सकता हूँ।

rajendrajee के द्वारा
June 9, 2012

You have choosen a nice topic for discussion and narrated the facts very well. In my view your discription is simply related with “Self-apprisal” which is totally different from “Atma-sakhhatkar’. “Atma-sakhhatkar” is a contineuing process to know one’s ownself through self-evaluaton in terms of self- realization.This is only possible when we are self discipline and have an equatable and unbiased inquisitiveness with an honest feeling and considerateness towards all to whom we know.Then we will be able to evaluate ourself.

    June 10, 2012

    भाई कोई तो बताये यह क्या बोल गए और किस भाषा में बोल गए ………………..मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आया…………………

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 15, 2012

    Thank you Rajendra ji, Self-appraisal….. I was not thinking about this word when i was writing about Aatma-sakshatkar. Probably U took this as self-appraisal….

चन्दन राय के द्वारा
June 9, 2012

साधना जी , आत्मसाक्षात्कार आज के युग में उपेक्षा का शिकार है , अब दखिये अब इतने पाप झूठ हम बोलते करते है है की हम में इतनी शक्ति हिम्मत ही नहीं होती की हम आत्मसाक्षात्कार कर सकें , और जो ये साहस रखते हैं वो महान लोग होते हैं आपकी कलम ने आपके मन की संवेदना को उत्तम रूप में स्वर दिया है

    June 10, 2012

    हाँ…..हाँ…हाँ….. तो चन्दन जी आप भी मानते हैं कि साधना जी महान है…………!

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 11, 2012

    शुक्रिया चन्दन जी……. आपकी बात से मैं सहमत हूँ….. बहुत मुश्किल होता है खुद को स्वीकार करना….. !!

allrounder के द्वारा
June 9, 2012

नमस्कार साधना जी, बेशक बहुत अच्छा लिखती हैं आप, और आपका आत्मसाक्षात्कार भी प्रशंशनीय है, सच कहा आपने हम सिर्फ अपने बारे मैं अच्छी बातें ही सुनना पसंद करते हैं, किसी की जरा सी भी आलोचना हमें शूल सी चुभती है, किन्तु जब हम आत्म मंथन करें तो लाखों कमियां / बुराइयां स्वयं मैं पायेंगे ! वैसे जो बात हम अपने आत्म मंथन से अपने बारे मैं जान सकते हैं, वो शायद कबीर दास जी ने बहुत पहले ही एक दोहे मैं कह दी थी :) ” बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न पाया कोय !! जो मन देखा आपना मुझसे बुरा न कोय !! एक अच्छे आलेख पर हार्दिक बधाई आपको साधना जी ….. :)

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 9, 2012

    शुक्रिया सचिन जी…. :) सचिन जी कहते हैं न की जब तक हमे खुद किसी चीज़ का अनुभव नहीं होता हम दूसरों की कही बातें भूल जाते हैं…… सारी अच्छी और बुरी बातें पहले ही कही जा चुकी हैं लेकिन अब हम लोग अनुभव करते हैं तो खुद को बड़ा महान समझते हैं….. ज्ञानी समझते हैं….. !!

    June 9, 2012

    तो आप मानती है कि आप महँ और ज्ञानी है क्योंकि आपको तो आत्म-ज्ञान हो गया…..

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 11, 2012

    अनिल जी आपके कमेंट्स को पढ़ कर लग रहा है की आप बिना पढ़े ही कुछ भी लिखने पर उतारू हैं…. ऐसी कौन सी पट्टी पढ़ा दी है…. आपके गुरु जी ने….. :) :)

    June 12, 2012

    हाँ………हाँ………….हाँ……………..! मेरे विचारधारा गुरु और शिष्य से हटकर है………अतः गुरु और शिष्य होने का सवा ही नहीं उठता…………….! मेरे लिए आप भी गुरु हो, आप भी शिष्य हो………………यह चीज समझाना उतना ही मुश्किल है जितना किसी एक particular चीज को गुरु कहना आसान है………..कभी मौका मिलेगा तो जरुर बताऊंगा कि आखिर गुरु है क्या………………? वैसे दोस्तों को दुश्मन बनाना कोई आप मोहतरमाओ से सीखे……………..वैसे जो आप इगो मेरे अन्दर पैदा करने की कोशिश की है…….वो नहीं होने वाला ..कोई दुसरा रास्ता निकालिए हम दोस्तों को आपस में भिड़ाने का……………….!

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 13, 2012

    sorry Anil ji….. ये भिड़ाने का काम मैं नहीं करती…… मैं दोस्तों का महत्व समझती हूँ और हमेशा ही दोस्तों को साथ देखना चाहती हूँ…. चाहे वो मेरे दोस्त हों… या आपके….. तो ये इल्ज़ाम मत लगाइए मुझ पर …. ईश्वर की कृपा से आप दोनों दोस्तों की दोस्ती सलामत रहे…… :) :)

    June 14, 2012

    तो फिर sorry क्यों……………………………….?

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 14, 2012

    सॉरी इसलिए की मैंने आपकी उम्मीद तोड़ दी….. आपने उम्मीद की थी की “हम मोह्तार्मएं” भिड़ाने का काम अच्छे से करती हैं….. :) :)

    June 16, 2012

    हाँ….हाँ….हाँ…………..यही तो बात है की हम किसी से उम्मीद नहीं करते………..

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 16, 2012

    बहुत अच्छी बात है…..भांगड़ा कर लीजिये आप और अपने दोस्त को भी बुला लीजिये…… :) :)

Sumit के द्वारा
June 9, 2012

आत्मसाक्षात्कार से हमे शक्ति मिलती है जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करने की….. क्योंकि हम खुद को पहचान चुके होते हैं…………

    June 9, 2012

    जी आपकी बाते काफी हद तक सही है तो कृपया आप बताना चाहेंगे अपनी पहचान…………….!

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 11, 2012

    You are most welcome…

June 9, 2012

आपने अपने आलेख में पूरा कोशिश किया है एक ऐसे विचारधारा को रखने की जिससे आप बहुत प्रभावित है पर अफ़सोस पूरी तरह नाकामयाब हुई है सिवाय “हम खुद को ही नहीं जानते तो किसी दूसरे को कैसे जानेंगे….” इसके क्योंकि आप अपनी शैली के साथ-साथ वह शैली भी पकड़ नहीं पायी है…….क्योंकि कि कुछ चीजे कापी नहीं कि जा सकती सिर्फ उत्पन्न ही कि जा सकती है. खैर…….. आपके आलेखों से स्पष्ट पता चल रहा है कि कुछ परेशान सी है आप………..फिलहाल आप अलोक श्रीवास्तव का यह ग़ज़ल पढ़िए और कुछ समय के लिए खुद को भूल जाइये ..अच्छा लगेगा…. सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के’ जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के’ तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ ।

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 9, 2012

    :) :) ये ग़ज़ल तो अच्छी है लेकिन मैं इसे सुन सुन कर bore हो चुकी हूँ अब……!! मेरे आलेखों से पता चलता है की मैं कुछ परेशान सी हूँ….. क्योंकि मेरे आलेख कॉपी नहीं होते….. जैसा मैं महसूस करती हूँ वैसा ही लिख देती हूँ….. मैं अपने आलेखों को किसी कसौटी पर नहीं कसती….. किसी की शैली में नहीं बांधती….. अब ये तो वही बात हो गयी दो बच्चो को A B C D…… आती है तो कोई एक बच्चा दूसरे बच्चे को कहने लगे की तुमने मुझे कॉपी किया है…… !! अफ़सोस मैं नाकामयाब रही…… अगली बार कामयाब होने की कोशिश करुँगी…… :) :)

    June 9, 2012

    लीजिये यहाँ भी शैली कॉपी करने की कोशिश पर अफशोस एक बार फिर …हाँ..हाँ….हाँ……!

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 9, 2012

    अनिल जी अब आप बता ही दीजिये किसकी शैली कॉपी कर रहे हैं हम…… मुझे भी तो पता चले…. मेरी फोटोकॉपी कौन है….. :) :)

    June 9, 2012

    अभी मैं आत्म-साक्षात्कार नहीं किया हूँ बहन जी. अतः मैं कुछ भी किसी के बारे में बताने में असमर्थ हूँ………………..चूँकि आप खुद का आत्म-साक्षात्कार कर चुकी है तो जवाब तो आप ही के पास होगा………..! फिल कोई मुझे यह तो बताये ……मैं कौन हूँ……………?

    vikramjitsingh के द्वारा
    June 9, 2012

    हम बताते हैं…… आप श्री श्री १००८ स्वामी अलीनानद महाराज जी हैं…… साधना जी…इन्हें अपने पेड़-पौधों-फूलों से बहुत लगाव है…… किन्तु…….ये तो बाबा हैं….सन्यासी हैं…..फिर मोह-माया क्यों….???? कृपया बताने का कष्ट करेंगे…..श्रीमान बाबा १००८ स्वामी अलीनानंद जी…..महाराज…..

    June 10, 2012

    अभी बाबा होश में नहीं हैं वत्स ………………….अतः कुछ भी बताने में असमर्थ हैं…………………

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 11, 2012

    अनिल जी, अगर मैंने आत्म- साक्षात्कार किया है तो मैं खुद को जानूंगी……… आप कौन हैं ये मैं नहीं जानती….. ज्यादा जानने के इच्छुक हैं तो कृपया संदीप जी को follow करे…..क्योंकि वो सर्वज्ञता की तरह व्यवहार कर रहे हैं…. उन्होंने बताया पहले मैं सुख वादी थी….. अब मैं दूसरी बीमारी से ग्रस्त हूँ…. तो बेशक वो आपके बारे में भी बता देंगे…. !! :)

follyofawiseman के द्वारा
June 9, 2012

साधना जी, एक प्रसिद्ध कहावत है……’आसमान से गिरे और खजूर पर अटकें……’ आप पहले से बीमार थी और आपके मित्र ने आपको एक नई बीमारी दे दी…..पहले आपकी बीमारी ये थी की आप खुद को सुखवादी मानती थी….लेकिन अब अपने उससे भी गहरी बीमारी पाल ली है खुद को दुखवादी मानने की……वैसे ‘दुखवादी’(Sadist) उसको कहते है जो दूसरों को दुखी देख कर खुश होता हो….जो खुद को कष्ट पहुँचता है हम उसको masochist कहते है….औरतें आम तौर पर masochist होतीं है….she enjoys torturing herself. She finds ways to torture herself. एक और बात ये आपने आत्मा से साक्षात्कार किया कैसे……? ये बात तो ऐसे हो गई जैसे, कुत्ते ने ख़ुद से ख़ुद की puchh पकड़ ली हो……? अगर आपने आत्मा से साक्षात्कार किया तो फिर आप कौन हैं…..?

    June 9, 2012

    सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के’ जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के’ तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ । भाई यह जो रचना मुझे इ-मेल किये थे इसे पढ़ने के बाद पिछले तीन दिनों से मैं भी होश में नहीं हूँ यदि आप दोनों में से किसी को यह समझ में आ गया हो कृपया मुझे भी बता दीजिये कि मैं कौन हूँ………………..? “एक और बात ये आपने आत्मा से साक्षात्कार किया कैसे……? ये बात तो ऐसे हो गई जैसे, कुत्ते ने ख़ुद से ख़ुद की puchh पकड़ ली हो……? ” हाँ…..हाँ….हाँ…… कंबख्त ये कुत्ते भी बड़े अजीब होते हैं……..मेरे नज़र में न “आदमी” होते हैं और ना “जानवर” होते हैं…..मैं तो कहता हूँ कि “जनावर” होते हैं….आप दोनों का क्या ख्याल है……………………….?

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 9, 2012

    संदीप जी आपके लेख और कमेंट्स पढ़ कर लगता है आप बुद्ध हो चुके हैं….. जिसने औरतों पर काफी शोध किया है….. और हाँ कुतों पर भी….. या ये कहूँ की हर किसी पर…. हर बीमारी…. हर प्राणी…. हर विचारधारा…. हर एक चीज़ पर आपका पूर्ण आधिपत्य लगता है…..!! आपकी कहावत तो एकदम सही है लेकिन यहाँ फिट नहीं बैठ रही…..!! बहुत अच्छा किया दुःख वादी शब्द का मतलब बता कर…. क्योंकि जिसने मुझे दुःख वादी कहा है उनके महानुभाव के अन्दर ऐसी आदतें हैं….. :) मैं आत्मसाक्षात्कार के पहले और बाद में … हमेशा ‘साधना’ ही रहूंगी…… :) :)

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 9, 2012

    ओह….. तो ये ग़ज़ल संदीप जी ने भेजी है…… तभी कहूँ……… :) :) मेरी समझ में नहीं aayi…… बुद्ध जी से ही समझ लीजिये आप……. :) संदीप ji को ज़रूर पता होगा की आप कौन हैं……. :)

    June 9, 2012

    भाई कोई तो बता दे कि मैं कौन हूँ……………………..!


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