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जोरू और उसका गुलाम.....

Posted On: 27 Jun, 2012 Others में

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कई साल पहले एक गाना आया था “मैं जोरू का गुलाम बनके रहूँगा” उस वक़्त मुझे जोरू का मतलब नहीं पता था….. मै सोचती थी जोरू मतलब ‘गर्लफ्रेंड’ ….. क्योंकि फिल्मों में भी तो ऐसा ही कुछ दिखाते थे….. !! अब समझ आता है ‘जोरू’…. और ‘गुलाम’ दोनों का मतलब… :) :)

ये बात थोड़ी कम समझ में आती है… कोई अपनी बीवी से प्रेम करे तो उसको ऐसी उपाधियाँ क्यों देते हैं लोग…. और फिर कहीं नयी नवेली दुल्हन लाकर अगर उसने प्रेम कर लिया तब तो बस….. हो गया उसका कल्याण……. माँ बाप बहन और बाकी के घर वालों के तानों से भगवान् भी नहीं बचा सकते उसको…!! हाय रब्बा !! बेचारा लड़का…!! कौन समझे उसके मन की पीड़ा….. और बेचारी दुल्हन….. वो ना खुश हो सकती है ना दुखी…. अजीब सी परिस्थिति है…… !!

कोई दूसरा बताये या किसी और के साथ हो ऐसा तो बात हंसी मज़ाक और छेडछाड में निकल जाती है….. लेकिन ये है बड़ी गंभीर समस्या…. और कभी कभी रिश्ते बिगड़ भी जाते हैं….. या तो पति-पत्नी के बीच या फिर माँ-बाप के साथ….!!

मुझे समझ नहीं आता क्यों कोई लड़का अपनी पत्नी से प्रेम नहीं कर सकता है…. घर वालों को क्यों परेशानी होती है….. ‘खासकर माँओं को होती है….’ और ये भी एक बहुत बड़ा कारण है सास-बहू के रिश्ते में दरार होने का…. !!

अरे भई एक लड़की जो अपना घर परिवार छोड़ कर आपके घर में आई है तो इसी प्यार के भरोसे पे आई है ना…. कितना मुश्किल होता है अपने माँ बाप को छोड़कर किसी और के घर में जाना वो भी ज़िन्दगी भर के लिए…… उसपे अगर ख़राब व्यवहार हो उस लड़की के साथ तब तो जीना ही मुश्किल हो जाए….. !! अगर घर की बुज़ुर्ग महिलायें ये कहती हैं की कोई नया काम नहीं किया है…. हम भी आये थे अपने माँ बाप को छोड़कर, हर लड़की को करना पड़ता है….. तो मैं उन माताओ से कहना चाहूंगी कि आपको जिन बातों से तकलीफ हुई है वो अपनी बहुओं के साथ मत दोहराइए….. ज़रा सोचिये आपकी बेटी को भी दूसरे के घर जाना है…. :)

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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
February 27, 2013

सच है ! बड़ी अच्छी रचना !

ajaykr के द्वारा
July 8, 2012

ज्वलंत विषय हैं …………..अभी यह उपाधि नही मिली हैं ……मिलने पर एहसास के साथ कमेन्ट लिखूंगा मैम …हा हा हा …बहुत खूब आपने लिखा हैं ……… http://avchetnmn.jagranjunction.com/2012/07/02/आधुनिक-शिक्षा-का-यह-रूप-भी/

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 9, 2012

    Thank You So Much Ajay ji….. jaldi hi aapko iss upaadhi se navaza jaaye meri aisi kaamna hai… :)

    ajaykr के द्वारा
    July 11, 2012

    शुक्रिया ….जी

D33P के द्वारा
July 4, 2012

रिश्ता कोई भी हो. जिसे आप प्रेम करते है ,उसकी गुलामी करना भी अच्छा लगता है !

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 5, 2012

    सही कहा दीप्ति जी…. मगर ये ज़ालिम दुनिया इस बात को कहाँ समझती है….. :)

rekhafbd के द्वारा
July 2, 2012

साधना जी ,हर रिश्ते की एक अपनी गरिमा होती है माँ का एक अपना स्थान होता है ,बहन का अपना और पत्नी का अपना ,पत्नी को अपने पति का प्यार पाने का पूरा अधिकार है ,लेकिन यह मानव स्वभाव है , माँ यह भय कही उसका बेटा उससे छीन न जाए ,बहन के प्यार में भी ऐसा ही अहसास और पुरुष का अहम पत्नी को उसके अधिकार से कभी कभी वंचित कर देता है जबकि पति पत्नी का रिश्ता बहुत ही मधुर होता है इसमें तो दोनों ही एक दूसरे के गुलाम होते है ,बढ़िया आलेख ,बधाई

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 3, 2012

    शुक्रिया रेखा जी…. :) :)

June 30, 2012

“कोई अपनी बीवी से प्रेम करे तो उसको ऐसी उपाधियाँ क्यों देते हैं लोग…. ” क्योंकि बीबी को हवश और भोग की वास्तु समझ जाता है हमारे समाज में” मैं अभी हल ही में अपने एक दोस्त की शादी में गया था.वो और उसके घरवाले बहुत ही सज्जन हैं …….पर जब दुल्हन घर पर आई तो दोस्त की माँ और बहन दोनों ही दोस्त को समझाने लगे कि इससे बचकर रखना और इसे हमेशा दबाकर रखना , नहीं तो सर पर चढ़ जाएगी….! मैं तो सुनकर आश्चर्य चकित रह गया. अभी दुल्हन को आये एक दिन भी नहीं हुआ और राजनीती चालू……! यही वर्चस्व और दर के लिए अधिकतर घरों में झगड़े कीशुरुवात होती है………..प्रेम वहां होता ही कहाँ हैं…………! आपकी बैटन से १००% इत्तेफाक रखता हूँ……और अधिकतर केसों में देखा जाता है कि एक घर में नफ़रत का बिज माँ और बहन ही बोती है क्योंकि वह नहीं चाहती कि कोई दुसरे घर की बेटी यहाँ बेटी बनकर रहे हैं………….यह सब मानसिकता का खेल है मतलब मानव स्वभाव ……….!

    June 30, 2012

    बहुत ही उपयोगी विषय चुना है इसबार आपने…………….हार्दिक आभार और बताएं आत्म साक्षात्कार कहाँ तक पहुंचा………….!

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 30, 2012

    और ऐसी लड़कियां दूसरे घर में जाकर भी हडकंप मचाती हैं……हर चीज़ के दो पहलु होते हैं….. शायद ये बात भूल जाते हैं ऐसे लोग….. :) :)

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 30, 2012

    आपका बहुत शुक्रिया….. आत्मसाक्षात्कार जारी है….. काश ये एक tablet होती एक बार में ही निगल लेते और हो जाता आत्मसाक्षात्कार…… :) :)

ashokkumardubey के द्वारा
June 29, 2012

अपनी पत्नी से प्यार करना हर पति क धर्म एवं कर्तब्य है पर आपकी बात उस सन्दर्भ में सही लगता है जब कोई पत्नी के प्रेम में पड़कर माँ बाप को एकदम दुत्कारने लगे शायद उसी को जोरू का गुलाम कहा गया है जोरू तो प्रेम की हक़दार है पर साथ साथ माँ बाप बहन भाई को भी बराबर नहीं तो थोडा प्यार जरुर करना चाहिए कोई इतना जरुर है जोरू को तो ज्यादा प्रेम करना ही पड़ता है बेशक इसके लिए कोई उसे जोरू का गुलाम हिन् क्यूँ न कहे एक अच्छा लेख

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 30, 2012

    अशोक जी स्वागत है आपका….. :) मैंने ये लेख ‘जोरू का गुलाम’ बोलने के विरोध में लिखा है….. मुझे एक बात कभी समझ नहीं आती….. लोग ये कैसे समझ लेते हैं कि उनका बच्चा उनको छोड़ कर किसी और के पास चला जायेगा….. अरे अपने खून पे अपने संस्कारों पे इतना भरोसा तो होना चाहिए….. और बहू दूसरी होती भी कहाँ है……!! आप अगर उसे अपनाएंगे नहीं तो वो आपके परिवार की ज़िम्मेदारी कैसे ले पायेगी…… !! और ये बात दोनों तरफ ही लागू होती है…. चाहे वो बहू हो या सास-ससुर…..!! एक खुशहाल जीवन के लिए दोनों को ही एकदूसरे को अपनाना बेहद ज़रूरी है….. !!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 28, 2012

पूरा भारत गुलाम है अगर जोरू का भी हो तो क्या बुराई.

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 29, 2012

    सच में…… फिर भी तो लोगों को परेशानी होती है…… :) :)

R K KHURANA के द्वारा
June 28, 2012

प्रिय sadhna जी, जब किसी की नई नई शादी होती है तो वो स्वाभाविक रूप से वो पत्नी की और ज्यादा झुक जाता है फिर उसमें कही न कहीं दूसरो को समय कम दे पाटा है तो लोग यही कहते है की यह तो जोरू का गुलाम हो गया है ! हर बात पत्नी की मानने के कारण भी ऐसे कहा जाता है ! अच्छा विषय उठाया है आपने ! धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
June 28, 2012

साधना जी…. कोई कहता है तो कहने दीजिये न….इस जुमले का भी एक अलग ही आनंद है….अब अपनी बीबी की बातें मानना गुलामी है तो ऐसी गुलामी मंजूर….वैसे भी पडोसी की बीबी की गुलामी करने पर…..आप समझ सकती है….राम बचाएं….

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    हा हा हा हा….. खूब कहा आपने अजय जी…… स्वागत है आपका…..!!

anujdiwakar26 के द्वारा
June 28, 2012

शुभ प्रभात साधना जी!आपके विचार का मैं स्वागत करता हूँ और उनसे पूरी तरह सहमत हूँ. बहू कितने भी अच्छे काम कर ले.लेकिन उनकी एक छोटी सी गलती या यूँ कहें उनका अपनों के प्रति अत्यधिक प्यार सास को बर्दाश्त नहीं होता.आखिरकार लड़कियां होती ही हैं प्रेम की मूरत.तो फिर उनसे उस प्यार को सीमित रखने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता.. आपका लेख अत्यधिक सुन्दर है.मैं लिखने में तो अभी अनाड़ी हूँ इसलिए उचित शब्दों में तो बयां नहीं कर सकता..हार्दिक बधाई!! मेरा पहला ब्लॉग इच्छा पर आधारित है..उसे पढ़े और अपने विचारों से हमे अवगत कराये.. http://anujdiwakar26.jagranjunction.com

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    शुक्रिया अनुज जी…. आपका स्वागत है….. आपके शब्द मुझे अच्छे लगे…… :) :)

dineshaastik के द्वारा
June 28, 2012

साधना जी, मुझे इसका कारण  मनोवैज्ञानिक  लगता है। आज  की सास  जब कल  बहू थी और उसने जो जो झेला था, शायद वह उसका लेती है। इस  तरह  वह अपने आपको संतुष्ट करती है। जोरू का गुलाम  गाली तो नहीं है लेकिन लगती गाली जैसा ही है।  हास्य व्यंग  के साथ  साथ  ज्वलंत  सवाल  खड़ा करता हुआ   प्रभावित  करता हुआ   आलेख  निश्चित  ही सराहनीय  है। बधाई…….

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    शुक्रिया दिनेश जी… अब क्या कहूँ मैं….. मुझे नहीं लगता की ये मनोवैज्ञानिक कारण है…. ये सिर्फ अपने और पराये का फर्क है….. इससे ज्यादा कुछ नहीं….. !! अगर गाली की बात करें तो कोई शब्द तब तक बुरा नहीं लगता जब तक उसको बोलने वाले की भावनाएं अच्छी हों…..!!

anjuarya के द्वारा
June 27, 2012

साधना, तुमने अच्छा विषय उठाया है. सचमुच यह बात जानने योग्य है. क्यों बेटे का अपनी पत्नी को प्रेम करना घर वालो को नहीं सुहाता?  थोडा महसूस होना तो स्वाभाविक है, जो बेटा अब तक हमारा था अब उस का ध्यानहमसे बाँट गया है किन्तु शीघ्र ही मन को समझा लेना चाहिए क्योंकि आखिरकार बहू भी तो अब हमारी अपनी ही है. उसे भी हम अगर प्यार करेंगे तो अब तो घर का ध्यान रखने वाले दो हो जायेंगे. अब बहू भी तो घर का ध्यान रखेगी. अंजू आर्या

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    अंजू जी….स्वागत है आपका…… :) ठीक कह रही हैं आप जो बेटा अब तक हमारा था उसका ध्यान हमसे बँट गया ….. लेकिन ये भी सोचने वाली बात है की एक बेटी अपने माँ बाप को छोड़ कर आ गयी…. मेरे बेटे के पास, मेरे परिवार के साथ रहने…. !! बेटा तो हमारे पास पूरी ज़िन्दगी रहेगा….. थोड़ा ध्यान ही तो बँटा है…..!! और हमेशा येही कहा जाता है की बेटियां बेटों से ज्यादा माँ बाप का ध्यान रखती हैं…. इस बेटी (बहू) को प्यार देकर देखिये तो सारी ज़िन्दगी आपकी सेवा करेगी… :)

pritish1 के द्वारा
June 27, 2012

ज्यादा कुछ तो नहीं समझ पाया……पर लास्ट वाली फोटो अच्छी लगी……. प्रीतीश

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    सब समझ जाओगे…… बालक….. :) :)

Mohinder Kumar के द्वारा
June 27, 2012

साधना जी, चलिये आप को अब “जोरू के गुलाम” का अर्थ पता चल गया है तो उन्हे गुलाम बनाने में अधिक समय नहीं लगेगा.. वैसे यहां सभी बेगम के गुलाम हैं…. अन्त में यही कहूंगा…”कुछ तो लोग कहेंगे… सो कहने दीजिये जो कोई कुछ भी कहता है” लिखती रहिये.

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    मोहिंदर जी नमस्कार….. :) अब यहाँ से तो नया topic मिल गया लिखने के लिए….. :)

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
June 27, 2012

सही कह रही हैं साधना जी, शायद आप शादी शुदा हैं और आपके पति को यह उपाधि दी जा चुकी है इसलिए आपकी बातों में इतना वजन आ गया है…. मुझे भी कुछ लोगों द्वारा यह उपाधि दी जा चुकी है….इसलिए मैं आपकी बातों को अच्छे से समझ रहा हूँ…. आपसे मुझे मेरे एक लेख पर कमेन्ट की उम्मीद थी जो अभी तक पूरी नहीं हुयी है कृपया मेरा ये लेख पढ़े और अपनी राय व्यक्त करें… http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/06/20/नारी-का-जीवन/

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    :) :) अनिल जी….. अगर मैं कहूँ कि अभी मेरी शादी नहीं हुई है तो क्या मेरी ये बातें हल्की हो जाएँगी….. :) :) जानकर ख़ुशी हुई कि आप अपनी पत्नी से प्रेम करते हैं….(वर्ना ये उपाधि ना मिलती… :) ) अनिल जी किसी बात को समझने के लिए उस चीज़ का होना ज़रूरी नहीं….. जैसे आपने नारी के बारे में इतने सारे लेख लिखे…. और आप पुरुष हैं…. ये हम इंसानों को ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक विशेष गुण है जो हम एक दूसरे की भावनाओं को समझ सकते हैं…. और समझाने की कोशिश कर सकते हैं….. :) मैं अभी आती हूँ आपके ब्लॉग पर…..

allrounder के द्वारा
June 27, 2012

नमस्कार साधना जी, बहुत ही स्पेशल विषय पर स्पेशल और अच्छे तरीके लिखे गए आपके आलेख को पढ़ कर सारे तथा कथित जोरू के गुलाम प्रसन्न होंगे, वर्ना इन बेचारों का सदा समाज ने मजाक ही बनाया है, अपने इनका पक्ष रखा इसके लिए आप बधाई की पात्र हैं :) :)

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    सचिन जी…. नमस्कार… आपका बहुत शुक्रिया…. :) :) :)

yamunapathak के द्वारा
June 27, 2012

मजेदार,और विचारणीय भी,उनके लिए जो ऐसी उपाधि से औरों को नवाज़ते हैं चित्र और उस पर लिखा सन्देश बहुत खूब. धन्यवाद साधनाजी.

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    Thankyou so much Ma’am…. :)

Chandan rai के द्वारा
June 27, 2012

साधना जी , आपके आलेख में गंभीर और हास्य दोनों पुट है , शब्दों का संतुलन बेहतरीन तरीके से हमे समझा भी गया ,और हंसा भी गया , एक नारी का दूसरी नारी को आग्रह बेहद सुन्दर लगा !

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 28, 2012

    शुक्रिया चन्दन जी….. :)

chaatak के द्वारा
June 27, 2012

साधना जी, आपका आंकलन बिलकुल सही है न जाने कितनी भ्रामक परिभाषाएं बना रखी हैं हमने शायद ये वो मसाले हैं जिनसे जीवन में थोडा चटपटापन थोड़ी शिकायत थोडा प्यार और जीने के लिए थोड़ी जिजीविषा मिलती रहती है बशर्ते इन्हें सार्वभौम नियम मानकर हम लकीर के फ़कीर न बन जाएँ| अच्छे लेखन पर हार्दिक बधाई!

    sadhna srivastava के द्वारा
    June 27, 2012

    शुक्रिया चातक जी…. :)


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