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किससे कहूँ....

Posted On: 30 Jun, 2012 Others में

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ना जाने क्या होता है कभी कभी…
इतनी भीड़ में भी अकेला होता है..!!
लगता है किससे कहूँ…..
अपने दिल की बात….
जब कोई नहीं दिखता…
ख़ास…..
जबकि सब होते हैं पास….. !!
किसपर करूँ इत्मीनान….
सब करते हैं नाटक….
ख़ास होने का….
पर चाहिए उनको भी एक मौका….
जब तोड़ देते हैं भरोसा…..
विश्वास और प्यार का रिश्ता….!!
उसने कहा मुझे बताओ….
अपने मन की हर बात….
पर वो भी कर गया विश्वासघात…
मेरी कमियां गिनवाकर…..!!

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anuj Diwakar के द्वारा
October 17, 2013

नाटकीयता से परे लिखी गयी बेहद भावपूर्ण और सुन्दर रचना …!!

aman kumar के द्वारा
February 27, 2013

लगता है किससे कहूँ….. अपने दिल की बात…. जब कोई नहीं दिखता… ख़ास….. जबकि सब होते हैं पास….. !! सच कहा है आपने दिल को छूने बाली प्रस्तुति !

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

बहुत सराहनीय प्रस्तुति. बहुत सुंदर बात कही है इन पंक्तियों में. दिल को छू गयी. आभार !

Himanshu Nirbhay के द्वारा
September 1, 2012

साधना जी, अच्छी रचना के लिए शुक्रिया| सच तो ये है की ” विश्वास मैं ही विष का वास होता है” फिर भी हर मोड़ पर विश्वास करना पड़ता है…that’s life….

rajuahuja के द्वारा
July 3, 2012

मन की बात , मन को ही कहने दो ! कर्तव्यों की वेदी पर , थके पग , त्यक्त पाते हो , स्वयम को ! राग-द्वेष -भेद , कर दर-किनार , आत्मभव ! मन को मनस्थ रहने दो ! मन की बात , मन को ही कहने दो !

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 4, 2012

    वाह राजकुमार जी…. क्या खूब कहा है….. आपका बहुत स्वागत है….. :)

yamunapathak के द्वारा
July 2, 2012

साधनाजी,बहुत सुन्दर रचना मन के कशमकश को व्यक्त करती है. बस खुद पर एतबार करना है . दुनिया तो अज़ब सराय खानी है हर चीज़ यहाँ की आनी जानी है इसलिए नो गिला;नो शिकवा.

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 3, 2012

    बस खुद पर एतबार करना है….. शुक्रिया मैम.. :) :)

Mohinder Kumar के द्वारा
July 2, 2012

साधन जी, मेरे द्वारा पोस्टिड “पहली बार मिले हो मुझसे” गीत की आखिरी पंक्तियों का भी आशय वही है जो आपकी कविता का है.. “उम्मीदों से मुझे है दहशत और रिश्तों से डर लगता है हिस्से टुकडों में बंटा हुआ हूं खुद को जोड न पाऊं मैं. पहली बार मिले हो मुझ से… क्या तुमको बतलाऊं मैं इसे आप मेरी आवाज में दिये हुये लिन्क पर सुन भी सकती हैं.

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 3, 2012

    जी बिल्कुल मोहिंदर जी…… :)

sonam के द्वारा
July 2, 2012

वैरी गुड मोर्निंग साधना जी आपकी कविता तो कल ही पढ़ ली थी लेकिन प्रतिक्तिया नही दे पाई ! सोचा आज सबसे पहले यही काम किया जाये ! ना जाने क्या होता है कभी कभी… इतनी भीड़ में भी अकेला होता है..!! लगता है किससे कहूँ….. अपने दिल की बात…. जब कोई नहीं दिखता… ख़ास….. जबकि सब होते हैं पास….. !! ऐसा ही होता है साधना जी कभी कभी जिन्दगी में हम अपनों की भीड़ में भी अकेले ही रह जाते है ! सुंदर व दिल की भावनाओ को बयाँ करती रचना के लिए बहुत बहुत बधाई !

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    Very Very Good Morning Sonam ji….. :) मेरी मोर्निंग वाकई गुड हो गयी इतने अच्छे कमेंट्स पढ़ कर…… Thank you So Much….. :)

rekhafbd के द्वारा
July 1, 2012

साधना जी किसपर करूँ इत्मीनान सब करते हैं नाटक ख़ास होने का पर चाहिए उनको भी एक मौका जब तोड़ देते हैं भरोसा विश्वास और प्यार का रिश्ता,इस दुनिया में इंसान अकेला ही आता है और अकेला ही जाता ,सारे रिश्ते यहीं के है ,सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    शुक्रिया रेखा जी…… ये बात मुझे बहुत अच्छी तरह समझ में आ रही है अब…..खामखाँ हम लोग परेशान होते हैं… :) :)

Ravinder kumar के द्वारा
July 1, 2012

साधना जी , सादर नमस्कार. साधना जी, बड़ा कठिन है ऐसे व्यक्तित्व का मिलना जिस पर आप अपनी हर अच्छाई और बुराई को जाहिर कर सकें. आप की कविता के सन्दर्भ में मुझे रहीम का एक दोहा याद आ रहा है——- रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोए. सुनी अठिलैहें लोग सब, बाँट ना लैहें कोए. जीवन की वास्तविक्ता से परिचित करवाती बेहतरीन रचना के लिए आप को बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं. नमस्ते जी.

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    स्वागत है रविंदर जी….. रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोए. सुनी अठिलैहें लोग सब, बाँट ना लैहें कोए!! बिल्कुल सही कहा है रहीम जी ने….. लेकिन मैं अगर पहले ही इस बात को मान लेती तो आज इतनी गहराई से समझ ना पाती….. :) :) आपकी शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद….. :)

chaatak के द्वारा
July 1, 2012

साधना जी, सादर अभिवादन, पहले तो आपके प्रोफाइल पिक्चर को देख कर लगा ये आप नहीं कोई और है| ब्लॉग खोलने पर पता चला आप ही हैं| ये तस्वीर ज्यादा अच्छी है शायद इसलिए कि ये आपके लेखन के मिजाज़ से काफी मिलती है| दिल के तारों को छू लेने वाली इन पंक्तियों को पढ़कर स्मृतियों के बहुतेरे पन्ने बड़ी तेजी से मानस-पटल पर फडफडाने लगे| बहुत ही खूबसूरत भाव अथाह गहराई! अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    :) :) आशीष जी ज्यादा अच्छी तस्वीर की तारीफ़ के लिए शुक्रिया……. कुछ भी तो एक सा नहीं रहता…. मन, मस्तिष्क, संवेदनाएं, मिजाज़ और तस्वीर……!! आप लोगों की ऐसी प्रतिक्रियाएं पाकर मन बड़ा खुश होता है…… आपका बहुत शुक्रिया…. :) :)

dineshaastik के द्वारा
July 1, 2012

इतनी कम उम्र में इस सच्चाई को समझ लेना वाकई कमाल है। इस संबंध में सरिता जी का भी बहुत ही सुन्दर ख्याल है। हर बार धोखा खाता हूँ बेवफा से, भरोसा नहीं जाता, मेरे मस्तिष्क में बार बार उठता यही सवाल है।। अपने आत्मज्ञान प्रप्ति को कविता के रूप में शेयर करने के लिये धन्यवाद के साथ ही बधाई……. http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/06/30/मंदिरों की लूट भारत की बरबादी

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    शुक्रिया दिनेश जी…… :)

sinsera के द्वारा
June 30, 2012

प्रिय साधना, क्या खूब अन्दर की बात निकाली है… उसने कहा मुझे बताओ…. अपने मन की हर बात…. पर वो भी कर गया विश्वासघात… मेरी कमियां गिनवाकर…..!! ज़िन्दगी के येही रंग होते हैं , अच्छा है कि आप को कम उम्र में ही आत्मज्ञान हो गया..खामखा ज्यादा ऊंचाई पर चढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्यूंकि जितनी ऊंचाई से गिरिये, चोट भी उतनी ही ज्यादा लगती है.. मैं ने काफी पहले एक नज़्म लिखी थी कुछ ऐसी ही….वक़्त निकाल के पढियेगा… http://sinsera.jagranjunction.com/2012/02/27/%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%9D-%E0%A4%B8%E0%A5%87/

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    ये तो सब ज़िन्दगी के अनुभव हैं….. जो हमेशा याद रहते हैं…लेकिन फिर भी ये मन सब जानते हुए भी गलतियों पे गलतियाँ करता जाता है…… शायद इसकी फितरत ही चोट खाना हो गयी है…. :) :) मैंने आपकी नज़्म पढ़ी….. सच्चाई बयां की है आपने…..!!

pritish1 के द्वारा
June 30, 2012

आपकी रचनायें जीवन्त होती हैं…अच्छा लगा ना जाने क्या होता है कभी कभी….. प्रीतीश

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    Thank you so much Pritish ji…. :) :)

allrounder के द्वारा
June 30, 2012

नमस्कार साधना जी, सरल शब्दों मैं गहरे एहसासात प्रदर्शित कर रही है, आपकी ये रचना ! बहुत – बहुत बधाई आपको !

    sadhna srivastava के द्वारा
    July 2, 2012

    नमस्कार सचिन जी….. आपका बहुत शुक्रिया मेरे शब्दों की गहराई को समझने के लिए…… :) :)


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