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“आँख जब खुले तभी सबेरा होता है कोई रौशनी की उम्र नहीं पूछता दूर जब अँधेरा होता है”

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sadhna srivastava


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College Bunk…..

Posted On: 27 Apr, 2012  
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“Self Evaluation”

Posted On: 21 Apr, 2012  
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We are always connected to God …..

Posted On: 19 Apr, 2012  
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पहली मुलाकात…..

Posted On: 16 Apr, 2012  
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My Father …..

Posted On: 9 Apr, 2012  
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वाह री शराब!!!!

Posted On: 30 Mar, 2012  
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परिचय…..

Posted On: 28 Mar, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

के द्वारा: ajaykr ajaykr

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

"कोई अपनी बीवी से प्रेम करे तो उसको ऐसी उपाधियाँ क्यों देते हैं लोग…. " क्योंकि बीबी को हवश और भोग की वास्तु समझ जाता है हमारे समाज में" मैं अभी हल ही में अपने एक दोस्त की शादी में गया था.वो और उसके घरवाले बहुत ही सज्जन हैं .......पर जब दुल्हन घर पर आई तो दोस्त की माँ और बहन दोनों ही दोस्त को समझाने लगे कि इससे बचकर रखना और इसे हमेशा दबाकर रखना , नहीं तो सर पर चढ़ जाएगी....! मैं तो सुनकर आश्चर्य चकित रह गया. अभी दुल्हन को आये एक दिन भी नहीं हुआ और राजनीती चालू......! यही वर्चस्व और दर के लिए अधिकतर घरों में झगड़े कीशुरुवात होती है...........प्रेम वहां होता ही कहाँ हैं............! आपकी बैटन से १००% इत्तेफाक रखता हूँ......और अधिकतर केसों में देखा जाता है कि एक घर में नफ़रत का बिज माँ और बहन ही बोती है क्योंकि वह नहीं चाहती कि कोई दुसरे घर की बेटी यहाँ बेटी बनकर रहे हैं.............यह सब मानसिकता का खेल है मतलब मानव स्वभाव ..........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

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नमस्ते साधना जी............ आपका लेख "अंत या शुरुआत " पढ़कर मैं डर सा गया था........उस लेख मैं कमेंट्स मैं कुछ लिख ही न पाया......... मैं आपसे एक कहानी शेयर करना चाहता हूँ.......आपका लाइफ का अनुभव मुझसे बहुत ज्यादा है.........किन्तु मैंने अपने 17 वर्ष के अनुभव में अपने जीवन से यही सिखने का प्रयत्न किया है................ Philosophy के एक professor ने कुछ चीजों के साथ class में प्रवेश किया. जब class शुरू हुई तो उन्होंने एक बड़ा सा खाली शीशे का जार लिया और उसमे पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े भरने लगे. फिर उन्होंने students से पूछा कि क्या जार भर गया है ? और सभी ने कहा “हाँ”. तब प्रोफ़ेसर ने छोटे-छोटे कंकडों से भरा एक box लिया और उन्हें जार में भरने लगे. जार को थोडा हिलाने पर ये कंकड़ पत्थरों के बीच settle हो गए. एक बार फिर उन्होंने छात्रों से पूछा कि क्या जार भर गया है? और सभी ने हाँ में उत्तर दिया. तभी professor ने एक sand box निकाला और उसमे भरी रेत को जार में डालने लगे. रेत ने बची-खुची जगह भी भर दी. और एक बार फिर उन्होंने पूछा कि क्या जार भर गया है? और सभी ने एक साथ उत्तर दिया , ” हाँ” फिर professor ने समझाना शुरू किया, ” मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि ये जार आपकी life को represent करता है. बड़े-बड़े पत्थर आपके जीवन की ज़रूरी चीजें हैं- आपकी family,आपका partner,आपकी health, आपके बच्चे – ऐसी चीजें कि अगर आपकी बाकी सारी चीजें खो भी जाएँ और सिर्फ ये रहे तो भी आपकी ज़िन्दगी पूर्ण रहेगी. ये कंकड़ कुछ अन्य चीजें हैं जो matter करती हैं- जैसे कि आपकी job, आपका घर, इत्यादि. और ये रेत बाकी सभी छोटी-मोटी चीजों को दर्शाती है. अगर आप जार को पहले रेत से भर देंगे तो कंकडों और पत्थरों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी. यही आपकी life के साथ होता है. अगर आप अपनी सारा समय और उर्जा छोटी-छोटी चीजों में लगा देंगे तो आपके पास कभी उन चीजों के लिए time नहीं होगा जो आपके लिए important हैं. उन चीजों पर ध्यान दीजिये जो आपकी happiness के लिए ज़रूरी हैं.बच्चों के साथ खेलिए, अपने partner के साथ dance कीजिये. काम पर जाने के लिए, घर साफ़ करने के लिए,party देने के लिए, हमेशा वक़्त होगा. पर पहले पत्थरों पर ध्यान दीजिये – ऐसी चीजें जो सचमुच matter करती हैं . अपनी priorities set कीजिये. बाकी चीजें बस रेत हैं.”

के द्वारा: pritish1 pritish1

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

साधना जी मेरा मानना है कि यह कहना कि मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ, अज्ञानता का घोतक  है। हाँ यदि यह कहा जाय  कि मैं उसे संभवतः जानता हूँ, तो इसका विरोध  करने या आलोचना करने का कोई आधार नहीं है। मेरा अनुमान है कि आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, फिर आत्मसाक्षात्कार  कैसे संभव है। मृत्यु के डर की आशंका ने मनुष्य  नें प्रथम  तो आत्मा की कल्पना की, फिर  आत्मा को अमर बना दिया और उसने मृत्यु के डर की आशंका को समाप्त कर  दिया। मैंने लोंगो से कहते सुना है कि मेरी आत्मा कहती है, मैं आत्मा से बोलता हूँ, मेरा आत्मा को ठेस  पहुँची है। भाई आत्मा में अभिव्यक्ति की शक्ति कहाँ से आती है। आत्मा कैसे बोलती है। यदि हम यह सवाल  करते हैं तो कहते हैं, तुम  क्या समझोगे इन बातों को यह अध्यात्म का रहस्यवाद है। अपने शब्दों के जाल  में ऐसा उलझा देंगे कि जब आपको उनकी भाषा समझ  में नहीं आयेगी तो अपनी नसमझी को छुपाने के लिये उनकी हाँ में हाँ मिला दोगे। यह मस्तिष्क के ही भाग  हैं जिन्हें हम  मन, आत्मा आदि का नाम  देते हैं। यह भी जरूरी  नहीं कि जो मेरी धारणा है वही सही हो। मेरा मानना है कि ज्ञान  कि अपूर्णतः से ही ईश्वर  का अस्तित्व है, ज्ञान  की पूर्णतः से ईश्वर  विलोपित  हो जायगा। परिवर्तन  प्रकृति का स्वाभाविक  नियम  है और यह  नियम हमारी सोच  एवं विचारों पर भी लागू होती है, यह हम  कभी यह नहीं कह सकते कि हम अपने आपको पूर्ण  रूप से जानते हैं फिर दूसरे  को जानने का तो कोई आधार दृष्टगत  नहीं होता। हर व्यक्ति अपने आपको महान  एवं सही स्थापित  करने के लिये परिभाषाओं का निर्माण एवं चयन करता है। समय  के परिवर्तन  के साथ  उसके विचारों एवं सोच  में परवर्तन  के  कारण  उसकी पूर्व  में चयनिय  एवं निर्मित  की गई परिभाषायें भी बदलती रहतीं हैं।  कोई  विचार या वस्तु किसी व्यक्ति के लिये लाभप्रद एवं उपयोगी हो वही दूसरे के लिये हानिकारक  एवं अनुपयोगी हो जाती है।  जैसे बीमार व्यक्ति् के लिये दवा उपोयगी है,  जबकि स्वस्थ  व्यक्ति के लिये अनुपयोगी है। विद्यार्थी के लिये उसके पुस्तक  उपयोगी किन्तु अशिक्षित  के लिये अनुपयोगी। यही नियम  सुख  एवं दुख  को प्रभावित  करते हैं। सुख  दुख  तो चक्र  की तरह चलते रहते हैं। आपके आलेख  से मैं सहमत  भी हूँ और असहमत भी, यह  विरोधाभास  की स्थिति सर्वत्र विद्यमान  हैं लेकिन  हम  इसे अनदेखा कर देते हैं। लेकिन  फिर  भी आपका आलेख  बहुत ही प्रभावशाली एवं अपनी तरफ  आकर्षित करने वाला है। बधाई....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के’ जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के’ तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ । भाई यह जो रचना मुझे इ-मेल किये थे इसे पढ़ने के बाद पिछले तीन दिनों से मैं भी होश में नहीं हूँ यदि आप दोनों में से किसी को यह समझ में आ गया हो कृपया मुझे भी बता दीजिये कि मैं कौन हूँ....................? "एक और बात ये आपने आत्मा से साक्षात्कार किया कैसे……? ये बात तो ऐसे हो गई जैसे, कुत्ते ने ख़ुद से ख़ुद की puchh पकड़ ली हो……? " हाँ.....हाँ....हाँ...... कंबख्त ये कुत्ते भी बड़े अजीब होते हैं........मेरे नज़र में न "आदमी" होते हैं और ना "जानवर" होते हैं.....मैं तो कहता हूँ कि "जनावर" होते हैं....आप दोनों का क्या ख्याल है............................?

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आपने अपने आलेख में पूरा कोशिश किया है एक ऐसे विचारधारा को रखने की जिससे आप बहुत प्रभावित है पर अफ़सोस पूरी तरह नाकामयाब हुई है सिवाय "हम खुद को ही नहीं जानते तो किसी दूसरे को कैसे जानेंगे…." इसके क्योंकि आप अपनी शैली के साथ-साथ वह शैली भी पकड़ नहीं पायी है.......क्योंकि कि कुछ चीजे कापी नहीं कि जा सकती सिर्फ उत्पन्न ही कि जा सकती है. खैर........ आपके आलेखों से स्पष्ट पता चल रहा है कि कुछ परेशान सी है आप...........फिलहाल आप अलोक श्रीवास्तव का यह ग़ज़ल पढ़िए और कुछ समय के लिए खुद को भूल जाइये ..अच्छा लगेगा.... सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के’ जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के’ तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ ।

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

साधना जी, एक प्रसिद्ध कहावत है......'आसमान से गिरे और खजूर पर अटकें......' आप पहले से बीमार थी और आपके मित्र ने आपको एक नई बीमारी दे दी.....पहले आपकी बीमारी ये थी की आप खुद को सुखवादी मानती थी....लेकिन अब अपने उससे भी गहरी बीमारी पाल ली है खुद को दुखवादी मानने की......वैसे ‘दुखवादी’(Sadist) उसको कहते है जो दूसरों को दुखी देख कर खुश होता हो....जो खुद को कष्ट पहुँचता है हम उसको masochist कहते है....औरतें आम तौर पर masochist होतीं है....she enjoys torturing herself. She finds ways to torture herself. एक और बात ये आपने आत्मा से साक्षात्कार किया कैसे......? ये बात तो ऐसे हो गई जैसे, कुत्ते ने ख़ुद से ख़ुद की puchh पकड़ ली हो......? अगर आपने आत्मा से साक्षात्कार किया तो फिर आप कौन हैं.....?

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

साधनाजी,यह आपका अंतिम ब्लॉग है यह मत कहिये आप एक बार मेरे नए ब्लॉग रूहों में समाये रिश्ते पढ़िए, और कुछ ना कुछ लिखते रहिये भले ही अंतराल में ही क्यों ना???????// मैंने अपने ब्लॉग अकेली हूँ से भी कुछ कहना चाहा है. आपके शब्द पढ़ती हूँ सिस्टम सही रहता है तो कमेंट्स सबमिट हो जाते हैं . अंत करना किसी भी चीज़ का हमारे वश में नहीं ज़िंदगी नदी की धारा है आगे बढ़ती है मंजिल भी पाती है पर राहों में पत्थर,चट्टानों से टकराते हुए,जीवन kabhee भी seedhee sadak पर नहीं chaltaa उछलती कूदती चंचल दरिया सी बहता है. मंच पर उपस्थित अपने संगी साथियों का ही हमारे लिखने से मार्गदर्शन ना हो पाए तो पुरे समाज के प्रति यह ज़िम्मेदारी भी कैसे निभे? हम सब कोसों दूर बैठकर भी एक दुसरे के सुविचारों से प्रभावित होते हैं.साधना,तुम इस मंच से नहीं जा रही हो. अच्छी शिक्षा पलायनवादिता नहीं परिस्थितियों का समझदारी से समाधान में निहित है अगर मेरी प्रतिक्रया के प्रत्येक लब्ज़ को समझ सको तो अपनी rachanaatmaktaa को अपनी सबसे मजबूत शक्ति बनाओ. सप्रेम यमुना

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीय  साधना जी प्रेम  के संबंध में मेरे विचारों में विरोधाभास  है। समय परिस्थितियों, समय  एवं उम्र  के साथ  विचारों में परिवर्तन  होना स्वाभाविक  है। परिवर्तन  प्रकृति का स्वाभाविक  नियम  है। जो विचार में नीचे उद्दत  कर  रहा हूँ वह नवयौवन  काल  के थे। आज  मेरा उन  विचारों से सहमत  होना संभव नहीं है- प्रेम सचमुच  ईश्वर का रूप, अरे जीवन है प्रेम  का कूप। प्रेम  को ईश्वर पूजा मान, प्रेम  में बसते हैं भगवान। प्रेम  में होता नहीं है स्वार्थ, प्रेम  करता है बस  परमार्थ। प्रेम  है केवल  नाजुक  चीज, हृदय में रहे प्रेम  का बीज। प्रेम  जग  में हर जगह  बिखेर, चाह अपना हो चाहे गैर। प्रेम  है ईश्वर का वरदान, प्रेम  से जीतो सकल  जहान। प्रेम  का न  है कोइ आकार, प्रेम  के होते विविध  प्रकार। प्रेम  का होता न कोइ मोल, प्रेम  तो होता है अनमोल। प्रेम  पर कब  किसका है जोर, जगत में प्रेम  प्रेम  का शोर। प्रेम  तो छीने दिन  का चैन, और  निन्द्रा न  आये रैन। प्रेम  है शीत  प्रेम  है आग, मिले उनको ही जिनका भाग। यह प्रेम  का एक  रूप है दूसरा रूप  फिर कभी......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय  साधना जी आपका आलेख  पढ़ते पढ़ते योजना  बना रहा था  कि प्रेम  के संबंध  में इस  तरह की टिप्पणी दूँगा। सोचा था प्रेम  के संबंध में बहुत  विस्तार से लिखूँगा। जीवन के सच्चे अनुभव  लिखूँगा। किन्तु अंत  के दो पैराग्राफ  हृदय  की गति रोकते रोकते बचा गये। हार्ट  अटैक  से यदि पीङित  होता तो संभवतः मुश्किल  होता। आप जैसी बेपाक होकर अपनी बात  कहने वाली, सत्य के लिये संघर्ष  करने वाली, अन्याय का पुरजोर  विरोध  करने वाली लेखिका से हमें वंचित  होना पङेगा। कृपया अपने निर्णय  पर पुनर्विचार करिये। हमें अपनी लेखन  कला से वंचित  नहीं करिये। आपका आभार व्यक्त करूँगा।

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के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है पेज 40-41 में .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

साधना मेरे साथ भी कुछ ऐसा हीं हुआ ,जब मैंने अपनी प्रेमिका के परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ अपनी प्रेमिका से कोर्ट में शादी कर ली तो उन सबों ने मुझसे और मेरी पत्नी से नाता तोड़ लिया पर माँ(मेरी सास ) का दिल देखो ,उन्होएँ मुझे माफ़ कर दिया ...अपने बेटों ,बहुओं से छुप कर हमसे मिलती रही ,अपना आशीष और दुलार हमपे वारतीं रहीं और २ साल पहले अपने आखिरी वक़्त में न बोल सकने की स्थिति में इशारों इशारों से मुझसे मिलने की इच्छा ज़ाहिर की ....मैं गया तो वो जो इतनी निशक्त हो गयी थी की न बोल पाती थीं और न हीं कुछ हरकत कर पातीं थीं ...पर उनकी ममता देखो ,उन्होंने मुझे न केवल मेरा नाम लेकर पुकारा ,बल्कि अपना पूरा बल बटोर कर उन्होंने मेरे सर पे हाथ रक्खा ...आज तुम्हारे इस भावनात्मक लेख ने उनकी याद फिर ताजा कर दी ....RATING -5/5

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: sadhna sadhna

के द्वारा: sadhna sadhna

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के द्वारा: Jayprakash Mishra Jayprakash Mishra

आदरणीय  राज  जी, आपकी बातों से पूर्णतया सहमत। आदरणीया साधना जी, ईश्वर है इसमें कोई संदेह नहीं है। किन्तु वैसा नहीं जैसा हमने बना रखा है। वह  विशाल  से भी विशाल है कि उसकी प्रतिमा बनाई नहीं जा सकती। वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है कि उसे किसी तरह नहीं देखा जा सकता है। वह सर्वशक्तिमान है किन्तु अपने जैसा दूसरा भी नहीं बना  सकता है। वह न्यायकारी है। किन्तु वह न तो क्षमा करता है  न क्रोधित होता है और न ही किसी पर खुश। क्योंकि ऐसा  करने से उसका न्याय के सिद्धांत  तिरोहित होता है। ईश्वर  द्वारा रचित  प्रथम  और संभवतः अंतिम  रचना वेद में यह वर्णित  है। अन्य मानवकृत रचनाओं ने ईश्वर के संबंध  में भ्रम  पैदा किया है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

साधना जी नमस्कार ! आपने बिलकुल सही सवाल पूछा है ! हम जीतनी आदर्शवादी बातें इस मंच पर करते हैं या लिखते हैं क्या उन्हें हकीकत की जिंदगी में भी उपयोग में ला पाते हैं ? शायद ना भी कर पाते हैं ! लेकिन इतना जरूर कहूँगा की अगर हम ऐसे माहौल में रहते हैं जहां सिर्फ अच्छी बातें ही लिखी जायें , कही जायें तो कुछ न कुछ बदलाव तो जरूर ही आता है ! आप शायद इस बात को स्वीकार करेंगी ! मुझे इतना जरूर लगता है की इस मंच के सभी सम्मानित सदस्य जितना संभव हो पा रहा होगा अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं इस समाज और देश को स्वच्छ करने में ! वो लिख रहे हैं , शायद कर भी रहे हैं ! मैं नाम तो नहीं लिखूंगा लेकिन स्पष्ट कहना चाहता हूँ की इसी मंच पर कुछ ऐसे भी सम्मानित सदस्य हैं जिनका पूरा जीवन ही समाज और देश को समर्पित है ! आपने बेहतरीन लेख लिखा है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: sadhna sadhna

विश्वास मन की शक्ति को जगाता है पर यह मान लेना कि ईश्वरीय शक्तिं इस ब्रहमांड में आकर कोई कम कर सकती है यह निरर्थक है | इश्वर यदि ऐसी शक्ति के साथ प्रथ्वी पर होता तो उन करोनो लोगों जोकि यदि आपकी द्रष्टि से मना जाये तो उसकी संताने ही है को भूखा नंगा बिलखता देखता रहता | आस्था अपने में बड़ी चीज़ जो संबल देती है ऐसा तो संभव है कि आप अपने ध्येय को सतुत्ति करें तो वो आपको वह सहक्ति दे कि आप निडर Exam में बैठें और भुत अच्छा परिणाम भी आये | पर आप कहें कि पेपर भी भगवान ने solve कर दिया तो यह आपका अन्ध्विशस है | बहुत से लोग कह सकते उन्होंने भगवान के दर्शन किये पर यह सब अत्यधिक सोचने के कारन हुए मष्तिष्क के जैव रसायन परिवर्तन है जो कभी ऐसे अक्स दिखाई देते है जो मोजूद नहीं होते | आस्था को चमत्कार के रूप में बदलने में देर नहीं लगती साधना जी आप जैसे तकनिकी छात्रा को अपने तार्किक दिमाग पर पूरा विश्वास होना चाहिए व इश्वर कि परिकल्पना एक अपनी आत्मा को परमार्जित करने वाले source ki tarah karni चाहिए न कि किसी सांसारिक कम को बनवाने के लिए एक अलोकिक शक्ति के रूप में . आपको यह विचार में hurt करने के लिए नहीं लिख रहा वरन जीवन के दर्शन के उस पहलु को बताने जिसे बहुत मंथन से में सीख पाया हूँ

के द्वारा: RaJ RaJ

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

एक दिन एक पादरी किसी स्कूल मे बच्चो को नेकी करने की सलाह दे रहा था, उसने बच्चो से कहा, 'पूरे दिन भर मे कम से कम एक अच्छा काम तो ज़रूर करो, जैसे किसी बूढ़े को रास्ता पार करवा दो, किसी गरीब की मदद करो दो......., नेकी करने की आदत डालो,' और साथ ही साथ उस पादरी ने ये भी कहा ही अगले दिन वह फिर आएगा और सब से पुछे गा किसने क्या किया....... अगले दिन...... पादरी ने सब बच्चो से बारी-बारी से पूछ,,,,,सब ने माना कर दिया......कोई कुछ करके नहीं आया था, पादरी थोड़ा निराश हो गया.....लेकिन जब वो आखरी बैंच पर बैठे तीन लड़को से पूछा तो उन तीनों से ने उछलते हुए कहा, ' हमे ने एक अच्छा काम किया कल' पादरी ने खुश होते हुए पहले लड़के से पूछ, 'बताओ बेटा क्या किया तूम.......?' पहले ने चहकते हुए जवाब दिया, 'मैं के एक बूढ़ी औरत को रास्ता पार करवाया.....' 'good, बहुत अच्छा', फिर दूसरे लड़के की और देखते हुआ पूछ, ' तुमने क्या किया बेटा' 'जी मैंने भी एक बूढ़ी औरत को सड़क पर करवाया', ' बहुत अच्छे', फिर उसने तीसरे से पूछा, 'आपने क्या किया बैठा, ' जी मैंने भी एक बूढ़ी औरत को रास्ता पार करवाया', आब पादरी थोड़ा चौंका,,,,,उसने पूछ, 'ऐसा कैसे.....? तुम सब को बूढ़ी औरात ही मिली,' तो उसमे से एक ने कहा, 'हम सब ने मिलकर एक ही औरत को ही पार कवाया,.....वो बहुत जिद्दी औरत थी, उस पार जाने को तैयार ही नहीं थी,,,,,हम उसे घसीट कर उस पार ले गए....' अपने फायदे के लिए दूसरों का भला करना, पुण्य कमाने के लिए सेवा करना, पाप है,.........

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जी, साधना जी आप साप को हिंसक ही क्यों मानती हैं. एक बात जान लीजिये कि कोई कितना भी विषैला जिव क्यों न हो? बिना कुछ किये किसी को हानि नहीं पहुचाता. आपके साथ एक वकवा हुआ और मेरे साथ ऐसे चार-पञ्च वाकया हो चुके हैं. मेरे सामने से सांप और बिच्छी निकल गए हैं पर मैं थोडा भी विचलित नहीं हुआ. न मुझको वह हनी पहुचाया और न मैंने उसको. यदि आप को ईश्वर में सच्चा विश्वास है तो आपको तो डरना ही नहीं चाहिए. क्योंकि जो ईश्वर हैं वो स्वार्थ और मनोकामनाओं से बहुत दूर हैं. वह हम स्वार्थी इंसान हैं जो उसे इसमें बांधे रखते हैं. जिसकी आप बात कर रही है उसे अन्धविश्वास कहते है. वैसे छोडिये यह विषय चिंतन और मनन का हैं न कि अन्धविश्वास और दर पैदा करने का. कृपया आप मेरा नंगा नाच देखे और हमेशा खुश रहें.... http://merisada.jagranjunction.com/2012/04/15/%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A8-2/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

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साधना जी अब क्या कहूं .... सुब्हान रबियन आला ! ......आपकी कविता इतनी जीवंत है कि ऐसा लगता है कि मैं आपके प्यार के बगिया का वो गुलफाम हूँ जिसके सामने आपके इस कविता की बीज बोई गयी है .......ऐसा लगता है जैसे आप वाकई एक पुरकशिश इंतजार के बाद अपने चाहने वाले एक अल्हड़ अलमस्त से लड़के से PVR के पास कहीं किसी काफी हाउस में मिली हैं और फिर coffee की चुस्कियों के साथ रफ्ता रफ्ता उसके गहरी आँखों के प्याले में भरकर प्यार की पुरनम चांदनी घुट घुट पीती रही हैं और फिर वो लड़का आपको वायदे और दिलासों की मीठी टीस दिए आपसे दूर चला गया है .....और उसकी जुदाई में,शबे फुरकत में आपकी आँखों से अश्कों की चंद बूंदे लुढ़ककर पन्नो पे पड़ती है और कविता बन जाती है....अगर ऐसा कुछ हुआ है तो आपसे यही कहूँगा कि इतिहास गवाह है कि प्यार की मुकम्माली ,उसकी पोशीदगी विसाल से ज्यादा हिज्र में होती है...सच्चे आशिक कभी नहीं मिलते .

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

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के द्वारा: RAJEEV KUMAR JHA RAJEEV KUMAR JHA

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